रावण यह जानता था कि वह अहंकारी है। उसे यह भी ज्ञात था कि अपने अंहकार के वशीभूत उसने अपने पिता को भी अपमानित किया था और सृष्टि के पंचदेवताओं को भी अपना शत्रु मानने लगा था।
रावण यह जानता था कि वह व्यभिचारी है। परस्त्रियों के प्रति उसकी मानसिकता कलुषित और दुर्भावनापूर्ण है। परन्तुं, अपने व्यभिचारी प्रविर्ती को संयमित करने के बजाय सर्वथा ही वह असहाय स्त्रियों पर आसुरी अट्टहास किया करता था और व्यभिचार के सम्मोहन में आकर ही उसने माता सीता का बलात अपहरण किया था।
रावण यह भी जानता था कि जिस हनुमान ने उसके पुत्र अक्षय कुमार का वध अशोक वाटिका में कर दिया है उसे बंदी बनाना उसके राक्षस सैनिकों के क्षमता के अधीन नहीं है। बावजूद इसके, अपने दंभ के वशीभूत होकर उसने हनुमान की पूँछ में आग लगवाई और सोने की लंका को भस्मीभूत होने दिया।
रावण यह भी जानता था कि अपने भाई विभीषण द्वारा किये जा रहे अनुरोध जिसमे युद्ध के पूर्व श्रीराम के शरणागत होने और सीता माता को सम्मानपूर्वक लौटाने का प्रस्ताव सर्वथा उचित था बावजूद इसके, प्रतिशोध की दुर्भावना के अधीन होकर रावण भगवान श्रीराम से युद्ध करने को उन्नमत्त था।
अतएव...
जब भी कोई रावण अंहकार के वशीभूत होकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने को उन्नमत्त होता है। अपने व्यभिचारी स्वभाव से दूसरों के प्रति कलुषित मानसिकता रखता है। भगवान के उपासक और उनके दूत को अनादर के भाव से उनकी पूँछ में आग लगाने को उन्ममत्त रहता है। अपने धर्मपरायण भाई द्वारा अच्छे सुझाव देने पर उसकी पीठ पर लात मारता है। तब-तब प्रकृति उसे रावण बनाकर उसके समूल कृतियों को भस्मीभूत कर देती है और समाज उसे केवल आततायी राक्षस के रूप में ही याद करने लगता है।
आप सबों को अधर्म पर धर्म के विजय की दशमी की शुभकामनाएं। जय जय श्री राम...