सोमवार, 8 जनवरी 2018

मेरा मधुपुर

इक दोपहर का क़िस्सा है जब शहर वो हमने छोड़ा था ,
उसके बाद कुछ ऐसी बीती शाम शराबों के थे हम ।

जौन एलिया के इस शेर को पढ़ते पढ़ते आज फ़िर से अपना मधुपुर सामने है ।

छोटा शहर, बड़े शहरों के आगे  मजबूर होता है या यूँ कहें कि वह बड़े शहरों का गुलाम होता है । ठीक वैसे ही जैसे  इतिहास में छोटे प्रान्त बड़े प्रान्तों  के सम्मुख लगभग हर मामले में मजबूर हुआ करता था । छोटे शहर को ना चाह कर भी बड़े शहरों की जी हुजूरी करनी ही पड़ती है । कारण यह है कि छोटा शहर अपने क्षेत्र में आने वाले सभी जनसंख्या को भरपेट भोजन , आवास और रोजगार की सुविधा उपलब्ध  करा ही नहीं सकता है ।

आज से तकरीबन  11 साल पहले मेरे भी छोटे से शहर ने मेरे सामने भी अपनी मजबूरी रुंधे गले से गिड़गिड़ाते हुए मुझे बोल दिया था और बिना मेरे पक्ष को सुने हुए उसने एक तरफ़ा आदेश पारित कर दिया था । मुझे शहर निकाला हुआ था ।

मैं बाध्य था ,मेंरे पास कोई ऑप्शन नहीं बचा था, क्योंकि बिहारी आदमी नॉक़री नहीं करेगा तो खायेगा क्या ?(खास करके सरकारी नॉकरी क्योंकि इसकी तैयारी में नाममात्र के पैसे खर्च होते हैं) ।  ये यक्ष प्रश्न आज भी यथास्थान विराजित है ।

घूमते भटकते आज वहाँ पहुँच गया हूँ जहाँ भीड़ ही भीड़ है । इतना कि कोई हिसाब किताब नहीं है । इस बड़े से शहर ने देश के लगभग सभी छोटे शहरों के मजबूरी को समझा तो है पर खुद बर्बाद हो गया है । सांस लेने में सांस अटक सी जाती है । मुझे किराए से ख़रीदी हुई हर चीज से नफ़रत है जिसके जिक्र फ़िर कभी ।

फिलहाल , 10 मिनट मैंने अपनी आँखों को  बंद किया था और  घूम आया था तुम्हारी गलियों में और याद आया कि :

बेक़रारी सी बेक़रारी है ,
वस्ल है और फ़िराक तारी है ।

शौक की इक उमीदवारी है ,
वरना किसको ख़बर हमारी है ।

जो गुज़ारी न जा सकी हमसे ,
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है ।

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई,
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है ।