बुधवार, 14 नवंबर 2018

अइले अइले झारखण्ड अब खहियौ शकरकंद

१८ साल, ०९ सरकार , ०२ राष्ट्रपति शासन (अधिकतम २.५ साल और न्यूनतम 11 दिन, मौजूदा सरकार को छोड़ कर) के स्वर्णिम इतिहास के साथ झारखण्ड अपने विकास के ३४वें पायदान पर मुँह बिचकाए खड़ा है ।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल को अगर छोड़ दिया जाए तो ये आँकड़े और भयानक लगते हैं । इसे राजनीतिक त्रासदी ही कहा जा सकता है लेकिन यहाँ राजनीति करने वालों के लिए यह सुनहरा अवसर साबित हुआ है ।

ये वो प्रदेश है जहाँ दो धुर विरोधी राजनीतिक पार्टियाँ अपनी स्वार्थसिद्धि और गद्दी के लोलुपता के लिए हाथ मिला कर सत्ता का नंगा नाच किया करती हैं ।

एक और वो धुरंधर राजनेता नेता है जो सत्ता के लालच में आकर अपने आइडियोलॉजी के पोथी में डोर बांध कर उस नवसिखुआ से ही हाथ मिला लेता है जिनके हाथों ही कभी उनकी अपमानजनक पराजय हुई थी ।

दूसरी और एक अकेला निर्दलीय विधायक है जो मुख्यमंत्री तक बन जाता है और हजारों करोड़ का कोल स्कैम कर अपना पेट फूला कर डकार तक नहीं निकालता है।

और तीसरी और वो नेता है जिसने मुख्यमंत्री की कुर्सी चले जाने पर अपनी नई पार्टी ही बना लिया । राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए यहाँ पार्टियाँ बनती गई और बनाती गई ।

मुख्यमंत्री बनने की रोचक कहानियों की लिस्ट में झारखण्ड को अग्रणी रखा जाना चाहिए ।

#झारखण्ड_१८

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

वृद्धाश्रम

दादी और पोती की वृद्धाआश्रम वाली तस्वीर सुबह से ट्रेंड ही पर है औऱ भावुक करने वाली भी ।

शहर और शहरी संस्कृति में रमे लोगों के लिए अब ये आम बात हो गई है । अमूमन शहरों की औसत साक्षरता दर अधिक होती है । जब लोग ज्यादा पढ़ लिख लेते हैं तो उन्हें अपने सभ्य होने का एहसास होने लग जाता है । और जब लोग सभ्य हो जाते हैं तो उनके सोचने का दायरा बढ़ जाता है । उनकी पहली प्राथमिकता खुलेपन की होती है । (मैं यहाँ अभद्र नहीं होना चाहूंगा) ।

समय के साथ परिवार बढ़ता है लेकिन जो नहीं बढ़ता है वो रहने का स्थान (स्क्वायर फीट में )और घर की चारदिवारियाँ । पहले स्थान पर विराजमान खुलापन और स्वछंदता अपने और अपने लोगों की आहुति मांगती है और आहुति दे दी जाती है ।

और फ़िर मर जाते हैं ऐसे अनमोल रिश्ते जो बेमोल हैं । शुक्रिया इन सब बातों से गावँ-घर के लोगों को कोई सरोकार नहीं है । गावँ आज भी बचा हुआ है इस प्राणघातक महामारी से ।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

मेरा मधुपुर

इक दोपहर का क़िस्सा है जब शहर वो हमने छोड़ा था ,
उसके बाद कुछ ऐसी बीती शाम शराबों के थे हम ।

जौन एलिया के इस शेर को पढ़ते पढ़ते आज फ़िर से अपना मधुपुर सामने है ।

छोटा शहर, बड़े शहरों के आगे  मजबूर होता है या यूँ कहें कि वह बड़े शहरों का गुलाम होता है । ठीक वैसे ही जैसे  इतिहास में छोटे प्रान्त बड़े प्रान्तों  के सम्मुख लगभग हर मामले में मजबूर हुआ करता था । छोटे शहर को ना चाह कर भी बड़े शहरों की जी हुजूरी करनी ही पड़ती है । कारण यह है कि छोटा शहर अपने क्षेत्र में आने वाले सभी जनसंख्या को भरपेट भोजन , आवास और रोजगार की सुविधा उपलब्ध  करा ही नहीं सकता है ।

आज से तकरीबन  11 साल पहले मेरे भी छोटे से शहर ने मेरे सामने भी अपनी मजबूरी रुंधे गले से गिड़गिड़ाते हुए मुझे बोल दिया था और बिना मेरे पक्ष को सुने हुए उसने एक तरफ़ा आदेश पारित कर दिया था । मुझे शहर निकाला हुआ था ।

मैं बाध्य था ,मेंरे पास कोई ऑप्शन नहीं बचा था, क्योंकि बिहारी आदमी नॉक़री नहीं करेगा तो खायेगा क्या ?(खास करके सरकारी नॉकरी क्योंकि इसकी तैयारी में नाममात्र के पैसे खर्च होते हैं) ।  ये यक्ष प्रश्न आज भी यथास्थान विराजित है ।

घूमते भटकते आज वहाँ पहुँच गया हूँ जहाँ भीड़ ही भीड़ है । इतना कि कोई हिसाब किताब नहीं है । इस बड़े से शहर ने देश के लगभग सभी छोटे शहरों के मजबूरी को समझा तो है पर खुद बर्बाद हो गया है । सांस लेने में सांस अटक सी जाती है । मुझे किराए से ख़रीदी हुई हर चीज से नफ़रत है जिसके जिक्र फ़िर कभी ।

फिलहाल , 10 मिनट मैंने अपनी आँखों को  बंद किया था और  घूम आया था तुम्हारी गलियों में और याद आया कि :

बेक़रारी सी बेक़रारी है ,
वस्ल है और फ़िराक तारी है ।

शौक की इक उमीदवारी है ,
वरना किसको ख़बर हमारी है ।

जो गुज़ारी न जा सकी हमसे ,
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है ।

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई,
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है ।